Monday, 18 July 2011

vastu tips on astro mantra दिशाओं में छुपी हैं प्रगति

दिशाओं में छुपी हैं प्रगति -उड़ते बादल, बहती हवाएँ, मानव, पशु, पक्षी यहाँ तक कि ग्रह, उपग्रह, दरिया का पानी सभी को चलने के लिए एक रास्ते की जरूरत होती है। जिन रास्तों के सहारे मानव व जीव-जंतु अपनों से मिलने के लिए लक्ष्य व गनतव्य प्राप्त करने को अनवरत रूप से गुजरा करते हैं। इन रास्तों को वास्तु शास्त्र में दिशाओं की संज्ञा दी गई है।
इन 10 दिशाओं में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का राज छिपा हुआ है जो एक शून्य में अपने आपको समाहित किए हुए है यानी सिर्फ शून्य जो एक है और शून्य भी। वास्तव में शून्य ही अपने आपमें सब कुछ समेटे हुए है। पृथ्वी, सूर्य, चंद्रादि ग्रह, उपग्रह सभी इस शून्य (10 दिशाओं) से उत्पन्न हुए। जलाशय में किसी टुकड़े को फेंकने पर जल तरंगे शून्य आकृति से गोलाकार में आकर किनारे में लुप्त हो जाती हैं। जिससे यह अनुमान लगता है कि अखिल विश्व व ब्रह्माण्ड शून्य (दिशा) में समाया है, शून्य को वास्तु में ब्रह्मस्थान कहा गया है जहाँ से दस दिशाएँ गुजरती हैं, इनका केन्द्र बिन्दु और परिधि भी शून्य है।
चाहे वह कम्प्यूटर हो या गणितीय संसार इस एक शून्य (दिशाओं) के बिना सब मिथ्या है। इन दिशाओं (शून्य) को स्वीकार करने पर ही कम्प्यूटर क्रांति और गण‍ितीय संसार पूर्णरूप से सफल हो पाया। एक के साथ मिलकर शून्य दस दिशाओं का निर्माण करता है जिनके इर्द-गिर्द सम्पूर्ण सृष्टि घूम रही है। गणित में यह सीधे 10 गुना हो जाता है अर्थात्‌ दस दिशाएँ जिनके आगे कुछ भी नहीं है। मानव जीवन को प्रत्येक तत्व दो प्रकार से नकारात्मक और सकारात्मक तौर पर प्रभावित करते हैं। मानव इनके सहारे ही सम्पूर्ण प्राकृतिक ऊर्जा, चुम्बकीय तरंगे तथा अन्य सकारात्मक ऊर्जा को प्राप्त करता है। चुम्बकीय तरंगे व प्राकृतिक ऊर्जा के स्रोत भी एक निश्चित दिशा में लाभ-हानि, प्रतिकूलता व अनुकूलता प्रदान करने में सहायक होते हैं। जिससे जीवन को प्रगति की रफ्तार मिल पाती है तथा व्यक्ति का विकास व उन्नति संभव हो पाती है।
हवा के चलने को आज भी भारत में उसे उसी दिशा का नाम दे दिया जाता है जैसे- पूर्व से चलने वाली हवा को पुरवाई इसी प्रकार अन्य दिशाओं में चलने वाली हवाओं का नाम होता है। प्रत्येक मानव जब भी चलता है किसी न किसी दिशा में ही चलता है बिना दिशा वह कभी चल ही नहीं सकता या तो वह सही दिशा में जाएगा या गलत दिशा में, गलत दिशा में चलने वाले को दिशाहीन, पथ भ्रष्ट की संज्ञा दी जाती है।
व्यक्ति, परिवार, समुदाय, समाज व राष्ट्र तथा विश्व की दिशा सही है तभी वह विकास कर सकता है, अपनी दशा को सुधार सकता है। दिशा ही तो है जिसके सहारे जीवन में सुख और दुःख की सौगात आया करती है। इन दिशाओं का बड़ा महत्त्व है चाहे वह लक्ष्य प्राप्त करने हेतु हो या फिर भवन निर्माण में हो, प्रत्येक पल हम इन दिशाओं के सहारे चलते हैं वास्तु में इन दिशाओं का विशेष महत्त्व है। जैसे किसी व्यक्ति को जीवन पथ में चलने की दिशा हीनता उसे कहीं का नहीं छोड़ती उसी प्रकार वास्तु शास्त्र में या भवन निर्माण में की गई दिशाओं की उपेक्षा उसे आजीवन भटकाती रहती है उसे कभी भी सुख चैन नहीं मिल पाता है।
सही और गलत दिशाओं का चयन बिल्कुल आप पर निर्भर है। जीवन में हमें हर पल सही दिशा की जरूरत रहती है। चाहे वह अध्ययन का क्षेत्र हो या व्यापारिक क्षेत्र या फिर भवन बनाने का क्षेत्र, सभी के नियम व दिशाएँ हैं जिनके सदुपयोग से आप अपने जीवन में बद्‍तर दशा को सुधार बेहतर बना सकते हैं। आधुनिकता की दौड़ व जानकारी के अभाव में हम वास्तु जैसे अमूल्य भवन निर्माण की कला के प्रयोग से वंचित रह जाते हैं जिसके कारण प्राकृतिक ऊर्जा का प्रवेश अवरूद्ध हो जाता है और जीवन भ्रम, दुःख, हानि, तनाव, क्रोध के भंवर में फँस जाता है।
वास्तु ही एक ऐसा विषय है जो दिशाओं तथा प्राकृतिक ऊर्जा का तालमेल बिठाते हुए जीवन के रास्तों को सुगम बनाता है। इस कला के प्रयोग से जहाँ हम प्राकृतिक तालमेल बैठाते हुए हानि से बच सकते हैं वही भवन अति सुन्दर और मजबूत तथा टिकाऊ भी बनाते हैं। वास्तु शास्त्र में दिशाओं को विशेष स्थान प्राप्त है जो इस विज्ञान का आधार है। यह दिशाएँ प्राकृतिक ऊर्जा और ब्रह्माण्ड में व्याप्त रहस्यमयी ऊर्जा को संचालित करती हैं जो राजा को रंक और रंक को राजा बनाने की शक्ति रखती हैं। इस शास्त्र के अनुसार प्रत्येक दिशा में अलग-2 तत्व संचालित होते हैं और उनका प्रतिनिधित्व भी अलग-2 देवताओं द्वारा होता है।
इस प्रकार है-
- उत्तर दिशा के देवता कुबेर हैं जिन्हें धन का स्वामी कहा जाता है और सोम को स्वास्थ्य का स्वामी कहा जाता है। जिससे आर्थिक मामले और वैवाहिक व यौन संबंध तथा स्वास्थ्य प्रभावित होता है। - उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) के देवता सूर्य हैं जिन्हें रोशनी और ऊर्जा तथा प्राण शक्ति का मालिक कहा जाता हैं। इससे जागरूकता और बुद्धि तथा ज्ञान मामले प्रभावित होते हैं। - पूर्व दिशा के देवता इंद्र हैं जिन्हें देवराज कहा जाता है। वैसे आम तौर पर सूर्य ही को इस दिशा का स्वामी माना जाता जो प्रत्यक्ष रूप से सम्पूर्ण विश्व को रोशनी और ऊर्जा दे रहे हैं। लेकिन वास्तुनुसार इसका प्रतिनिधित्व देवराज करते हैं। जिससे सुख-संतोष तथा आत्मविश्वास प्रभावित होता है। - दक्षिण-पूर्व (अग्नेय कोण) के देवता अग्नि देव हैं जो आग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिससे पाचन शक्ति तथा धन और स्वास्थ्य मामले प्रभावित होते हैं। - दक्षिण दिशा के देवता यमराज हैं जो मृत्यु देने के कार्य को अंजाम देते हैं। जिन्हें धर्मराज भी कहा जाता है। इनकी प्रसन्नता से धन, सफलता, खुशियाँ व शांति प्राप्ति होती है। - दक्षिण-पश्चिम दिशा के देवता निरती हैं जिन्हे दैत्यों का स्वामी कहा जाता है। जिससे आत्मशुद्धता और रिश्तों में सहयोग तथा मजबूती एव आयु प्रभावित होती है। - पश्चिम दिशा के देवता वरूण देव हैं जिन्हें जलतत्व का स्वामी कहा जाता है। जो अखिल विश्व में वर्षा करने और रोकने का कार्य संचालित करते हैं। जिससे सौभाग्य, समृद्धि एवं पारिवारिक ऐश्वर्य तथा संतान प्रभावित होती है। - उत्तर-पश्चिम के देवता पवन देव है। जो हवा के स्वामी हैं। जिससे सम्पूर्ण विश्व में वायु तत्व संचालित होता है। यह दिशा विवेक और जिम्मेदारी योग्यता, योजनाओं एवं बच्चों को प्रभावित करती है।

इस प्रकार यह ज्ञात होता है कि वास्तु शास्त्र में जो दिशा निर्धारण किया गया है वह प्रत्येक पंच तत्वों के संचालन में अहं भूमिका निभाते हैं। जिन पंच तत्वों का यह मानव का पुतला बना हुआ है अगर वह दिशाओं के अनुकूल रहे तो यह दिशाएँ आपको रंक से राजा बना जीवन में रस रंगो को भर देती हैं।

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