Thursday, 28 July 2011

विंड चाइम्स द्वारा दुर्भाग्य भगाए

फेंगशुई में पवन घंटियों के प्रयोग से सकारात्मक ऊर्जा की वृद्धि होती है.पवन घंटियों द्वारा उत्पन्न ऊर्जा भवन की नकारात्मक ऊर्जा का शमन के दुर्भाग्य को मिटाती है.पवन घंटियां अनेक छड़ो से मिलकर बनती है. पवन घंटी धातु या लकड़ी की बनी हो सकती है


पवन घंटी (विंड चाइम्स) चार छड:-

यदि मुख्य द्वार के पास वास्तु दोष है, तो उसके निवारण हेतु मुख्य द्वार पर चार छड़ो वाली पवन घंटी लगानी चाहिए. विंड चाइम्स को दरवाजे पर परदे के पास इस प्रकार लगाना चाहिए कि द्वार में प्रवेश करने वाले व्यक्तियों से वह टकरा कर मधुर ध्वनि उत्पन्न करे. इससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा की वृद्धि होने लगती है.


पवन घंटी (विंड चाइम्स) पांच छड:-

पांच छड वाली पवन घंटी का प्रयोग अध्ययन कक्ष में वास्तु दोष मिटाने के लिए किया जाता है. यदि अध्ययन कक्ष में छत पर बीम हो तो बीम के पास पांच छड़ो वाली पवन घंटी को लगाना चाहिए. अध्ययन कक्ष के द्वार पर भी यह पांच छड वाली विंड चाइम्स लगा कर लाभ लिया जा सकता है.

पवन घंटी (विंड चाइम्स) छह छड:-


ड्राइंगरूम में छह छड वाली पवन घंटी का उपयोग करना श्रेष्ठ फलदायक होता है. यह विंड चाइम्स उस स्थान पर लगानी चाहिए जंहा से आगुन्तको का प्रवेश होता है. इससे आने वाले अतिथि का व्यवहार आपके अनुकूल रहेगा तथा शत्रुता समाप्त होने लगती है.


पवन घंटी (विंड चाइम्स) सात छड:-


बच्चों के कमरों में सात छड़ो वाली पवन घंटी का उपयोग करना शुभ होता है. इससे बच्चे हमेशा आपके आज्ञाकारी होंगे. यदि बच्चे लापरवाह एवं मनमर्जी करने वाले हों, तो बच्चों के कमरे के द्वार पर सात छड़ों वाली विंड चाइम्स लटकानी चाहिए. यदि बच्चों का कमरा गलत दिशा में बना हुआ हो तो भी इस सात छड़ों वाली पवन घंटी का प्रयोग बच्चो के कमरे के द्वार के पास लटका के वास्तु दोष से छुटकारा पा सकते है.


पवन घंटी (विंड चाइम्स) आठ छड:-


आठ छड वाली विंड चाइम्स का प्रयोग कार्यालय में जिस स्थान पर आप बैठते हों, वंहा पर किया जा सकता है. यदि कार्य में मन नहीं लग रहा हो, अथवा कार्य क्षेत्र में प्राय: रुकावटें एवं नाना प्रकार की बाधाए उत्पन्न हों तो अपने कक्ष के द्वार पर यह आठ छड वाली विंड चाइम्स लटकानी चाहिए. इसका प्रयोग दरवाजे के अंदर परदे के पास लटका कर करना चाहिए.



पवन घंटी (विंड चाइम्स) नौ छड:-


यदि परिवार में सभी व्यक्तियों को बार बार रूकावटों या अनेक प्रकार की बाधाओं के कारण निराशा एवं उत्साहहीनता जैसी स्थिति बन रही हो तो नौ छड वाली विंड चाइम्स का प्रयोग ड्राइंगरूम में करना चाहिए. इसके प्रभाव से मानसिक परेशानी तो दूर होगी ही साथ हो आमदनी के नए मार्ग भी प्रशस्त होने लगते है और जीवन में नया उत्साह बनने लगता है.


गुड लक बेल:-


गुड लक बेल कई डिजाइनों में आती है. इसके ऊपर टांगने के लिए लाल धागा लगा होता है तथा नीचे लाल धागे की टसल लगी होती है. इसके ऊपर चीनी देवता, बुद्धा, कुआनायिन, पगोड़ा या कोई और शुभ चिन्ह बना होता है. यह यांग ऊर्जा की प्रतीक होती है. जो कि हमारे सौभाग्य के लिए अच्छी होती है. गुड लक बेल को हम घर, ऑफिस या दूकान के किसी भी भाग में लगा सकते है. यह हमेशा भाग्य वृद्धि करने वाली होती है.

Monday, 18 July 2011

Astro Mantra कितनी रखें भवन की ऊँचाई... Astro Mantra

चारदीवारी- मकान में चारदीवारी का निर्माण करते समय हमेशा ध्यान रखें कि दक्षिण-पश्चिम दिशा की चारदीवारी उत्तर व पूर्व दिशा की अपेक्षा मोटी व ऊँची रखें।
निर्माण कार्य चरणों में- यदि मकान में निर्माण कार्य चरणों में संपन्न कराने की योजना है, तो वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार ही संपन्न कराएँ। वास्तु के अनुसार सर्वप्रथम पश्चिम या दक्षिण दिशा में निर्माण कार्य करवाएँ।
मकान की ऊँचाई- वास्तु के अनुसार किसी मकान की ऊँचाई कितनी होनी चाहिए, इसका पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए। ऊँचाई का हिसाब निकालने के लिए मकान की चौड़ाई के 16वें भाग में चार हाथ, 96 अंगुल जोड़कर जितना योग हो, उसके बराबर ऊँचाई होनी चाहिए।
यदि बहुमंजिली मकान की योजना हो तो पहली ऊँचाई में से 12वाँ भाग कम करके दूसरी मंजिल की ऊँचाई रखें। यही क्रम तीसरी व क्रमशः चौथी मंजिल के लिए भी रखें। तीसरी मंजिल के लिए दूसरी मंजिल से 12वाँ मान कम करें। प्रत्येक मंजिल के लिए यह सामान्य क्रम ऊँचाई के लिए है।
यदि इस क्रम से 4, 31/2 , 3 हाथ जोड़ दें, तो यह ऊँचाई उत्तम मध्यम, कनिष्ठ तीन प्रकार की होगी। यदि इस क्रम में भी क्रमशः 4 हाथ में 20, 18, 16, अंगुल तथा 31/2 और 3 हाथ में 27, 21, 15 अंगुल और जोड़ें, तो उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ ऊँचाई के तीन-तीन भेद और हो जाएँगे। इस प्रकार कुल 12 भेद होंगे। इनमें 8वाँ व 10वाँ भेद समान होने

vastu tips on astro mantra दिशाओं में छुपी हैं प्रगति

दिशाओं में छुपी हैं प्रगति -उड़ते बादल, बहती हवाएँ, मानव, पशु, पक्षी यहाँ तक कि ग्रह, उपग्रह, दरिया का पानी सभी को चलने के लिए एक रास्ते की जरूरत होती है। जिन रास्तों के सहारे मानव व जीव-जंतु अपनों से मिलने के लिए लक्ष्य व गनतव्य प्राप्त करने को अनवरत रूप से गुजरा करते हैं। इन रास्तों को वास्तु शास्त्र में दिशाओं की संज्ञा दी गई है।
इन 10 दिशाओं में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का राज छिपा हुआ है जो एक शून्य में अपने आपको समाहित किए हुए है यानी सिर्फ शून्य जो एक है और शून्य भी। वास्तव में शून्य ही अपने आपमें सब कुछ समेटे हुए है। पृथ्वी, सूर्य, चंद्रादि ग्रह, उपग्रह सभी इस शून्य (10 दिशाओं) से उत्पन्न हुए। जलाशय में किसी टुकड़े को फेंकने पर जल तरंगे शून्य आकृति से गोलाकार में आकर किनारे में लुप्त हो जाती हैं। जिससे यह अनुमान लगता है कि अखिल विश्व व ब्रह्माण्ड शून्य (दिशा) में समाया है, शून्य को वास्तु में ब्रह्मस्थान कहा गया है जहाँ से दस दिशाएँ गुजरती हैं, इनका केन्द्र बिन्दु और परिधि भी शून्य है।
चाहे वह कम्प्यूटर हो या गणितीय संसार इस एक शून्य (दिशाओं) के बिना सब मिथ्या है। इन दिशाओं (शून्य) को स्वीकार करने पर ही कम्प्यूटर क्रांति और गण‍ितीय संसार पूर्णरूप से सफल हो पाया। एक के साथ मिलकर शून्य दस दिशाओं का निर्माण करता है जिनके इर्द-गिर्द सम्पूर्ण सृष्टि घूम रही है। गणित में यह सीधे 10 गुना हो जाता है अर्थात्‌ दस दिशाएँ जिनके आगे कुछ भी नहीं है। मानव जीवन को प्रत्येक तत्व दो प्रकार से नकारात्मक और सकारात्मक तौर पर प्रभावित करते हैं। मानव इनके सहारे ही सम्पूर्ण प्राकृतिक ऊर्जा, चुम्बकीय तरंगे तथा अन्य सकारात्मक ऊर्जा को प्राप्त करता है। चुम्बकीय तरंगे व प्राकृतिक ऊर्जा के स्रोत भी एक निश्चित दिशा में लाभ-हानि, प्रतिकूलता व अनुकूलता प्रदान करने में सहायक होते हैं। जिससे जीवन को प्रगति की रफ्तार मिल पाती है तथा व्यक्ति का विकास व उन्नति संभव हो पाती है।
हवा के चलने को आज भी भारत में उसे उसी दिशा का नाम दे दिया जाता है जैसे- पूर्व से चलने वाली हवा को पुरवाई इसी प्रकार अन्य दिशाओं में चलने वाली हवाओं का नाम होता है। प्रत्येक मानव जब भी चलता है किसी न किसी दिशा में ही चलता है बिना दिशा वह कभी चल ही नहीं सकता या तो वह सही दिशा में जाएगा या गलत दिशा में, गलत दिशा में चलने वाले को दिशाहीन, पथ भ्रष्ट की संज्ञा दी जाती है।
व्यक्ति, परिवार, समुदाय, समाज व राष्ट्र तथा विश्व की दिशा सही है तभी वह विकास कर सकता है, अपनी दशा को सुधार सकता है। दिशा ही तो है जिसके सहारे जीवन में सुख और दुःख की सौगात आया करती है। इन दिशाओं का बड़ा महत्त्व है चाहे वह लक्ष्य प्राप्त करने हेतु हो या फिर भवन निर्माण में हो, प्रत्येक पल हम इन दिशाओं के सहारे चलते हैं वास्तु में इन दिशाओं का विशेष महत्त्व है। जैसे किसी व्यक्ति को जीवन पथ में चलने की दिशा हीनता उसे कहीं का नहीं छोड़ती उसी प्रकार वास्तु शास्त्र में या भवन निर्माण में की गई दिशाओं की उपेक्षा उसे आजीवन भटकाती रहती है उसे कभी भी सुख चैन नहीं मिल पाता है।
सही और गलत दिशाओं का चयन बिल्कुल आप पर निर्भर है। जीवन में हमें हर पल सही दिशा की जरूरत रहती है। चाहे वह अध्ययन का क्षेत्र हो या व्यापारिक क्षेत्र या फिर भवन बनाने का क्षेत्र, सभी के नियम व दिशाएँ हैं जिनके सदुपयोग से आप अपने जीवन में बद्‍तर दशा को सुधार बेहतर बना सकते हैं। आधुनिकता की दौड़ व जानकारी के अभाव में हम वास्तु जैसे अमूल्य भवन निर्माण की कला के प्रयोग से वंचित रह जाते हैं जिसके कारण प्राकृतिक ऊर्जा का प्रवेश अवरूद्ध हो जाता है और जीवन भ्रम, दुःख, हानि, तनाव, क्रोध के भंवर में फँस जाता है।
वास्तु ही एक ऐसा विषय है जो दिशाओं तथा प्राकृतिक ऊर्जा का तालमेल बिठाते हुए जीवन के रास्तों को सुगम बनाता है। इस कला के प्रयोग से जहाँ हम प्राकृतिक तालमेल बैठाते हुए हानि से बच सकते हैं वही भवन अति सुन्दर और मजबूत तथा टिकाऊ भी बनाते हैं। वास्तु शास्त्र में दिशाओं को विशेष स्थान प्राप्त है जो इस विज्ञान का आधार है। यह दिशाएँ प्राकृतिक ऊर्जा और ब्रह्माण्ड में व्याप्त रहस्यमयी ऊर्जा को संचालित करती हैं जो राजा को रंक और रंक को राजा बनाने की शक्ति रखती हैं। इस शास्त्र के अनुसार प्रत्येक दिशा में अलग-2 तत्व संचालित होते हैं और उनका प्रतिनिधित्व भी अलग-2 देवताओं द्वारा होता है।
इस प्रकार है-
- उत्तर दिशा के देवता कुबेर हैं जिन्हें धन का स्वामी कहा जाता है और सोम को स्वास्थ्य का स्वामी कहा जाता है। जिससे आर्थिक मामले और वैवाहिक व यौन संबंध तथा स्वास्थ्य प्रभावित होता है। - उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) के देवता सूर्य हैं जिन्हें रोशनी और ऊर्जा तथा प्राण शक्ति का मालिक कहा जाता हैं। इससे जागरूकता और बुद्धि तथा ज्ञान मामले प्रभावित होते हैं। - पूर्व दिशा के देवता इंद्र हैं जिन्हें देवराज कहा जाता है। वैसे आम तौर पर सूर्य ही को इस दिशा का स्वामी माना जाता जो प्रत्यक्ष रूप से सम्पूर्ण विश्व को रोशनी और ऊर्जा दे रहे हैं। लेकिन वास्तुनुसार इसका प्रतिनिधित्व देवराज करते हैं। जिससे सुख-संतोष तथा आत्मविश्वास प्रभावित होता है। - दक्षिण-पूर्व (अग्नेय कोण) के देवता अग्नि देव हैं जो आग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिससे पाचन शक्ति तथा धन और स्वास्थ्य मामले प्रभावित होते हैं। - दक्षिण दिशा के देवता यमराज हैं जो मृत्यु देने के कार्य को अंजाम देते हैं। जिन्हें धर्मराज भी कहा जाता है। इनकी प्रसन्नता से धन, सफलता, खुशियाँ व शांति प्राप्ति होती है। - दक्षिण-पश्चिम दिशा के देवता निरती हैं जिन्हे दैत्यों का स्वामी कहा जाता है। जिससे आत्मशुद्धता और रिश्तों में सहयोग तथा मजबूती एव आयु प्रभावित होती है। - पश्चिम दिशा के देवता वरूण देव हैं जिन्हें जलतत्व का स्वामी कहा जाता है। जो अखिल विश्व में वर्षा करने और रोकने का कार्य संचालित करते हैं। जिससे सौभाग्य, समृद्धि एवं पारिवारिक ऐश्वर्य तथा संतान प्रभावित होती है। - उत्तर-पश्चिम के देवता पवन देव है। जो हवा के स्वामी हैं। जिससे सम्पूर्ण विश्व में वायु तत्व संचालित होता है। यह दिशा विवेक और जिम्मेदारी योग्यता, योजनाओं एवं बच्चों को प्रभावित करती है।

इस प्रकार यह ज्ञात होता है कि वास्तु शास्त्र में जो दिशा निर्धारण किया गया है वह प्रत्येक पंच तत्वों के संचालन में अहं भूमिका निभाते हैं। जिन पंच तत्वों का यह मानव का पुतला बना हुआ है अगर वह दिशाओं के अनुकूल रहे तो यह दिशाएँ आपको रंक से राजा बना जीवन में रस रंगो को भर देती हैं।

HANUMAN हनुमान चालीसा है चमत्कारिक CHALISHA KE PRABHAV

  • हनुमान चालीसा है चमत्कारिक ऑफिस में कुछ ठीक नहीं चल रहा... 
  • घर पर पति-पत्नी की नहीं बनती... विद्यार्थियों को परीक्षा का टेंशन है... 
  • किसी को भूत-पिशाचों का भय सता रहा है... मानसिक शांति नहीं मिलती... स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं पीछा नहीं छोड़ती... ऐसी ह...ी मानव जीवन से जुड़ी सभी समस्याओं का हल है रामभक्त श्री हनुमान के पास। 
  • परंतु आज के दौर में जब हमारे समयाभाव है और इसी के चलते हम मंदिर नहीं जा पाते, विधि-विधान से पूजा-अर्चना नहीं कर पाते हैं। ऐसे में भगवान की कृपा कैसे प्राप्त हो? क्या किया जा जिससे कम समय में ही हमारे सारे दुख-कलेश, परेशानियां दूर हो जाए? अष्ट सिद्धि और नवनिधि के दाता श्री हनुमान जी... जिनके हृदय में साक्षात् श्रीराम और सीता विराजमान हैं... जिनकी भक्ति से भूत-पिशाच निकट नहीं आते... हमारे सारे कष्टों और दुखों को वे क्षणांश में ही हर लेते हैं।
  • ऐसे भक्तवत्सल श्री हनुमान जी की स्मरण हम सभी को करना चाहिए। ये आपकी सभी समस्या का सबसे सरल और कारगर उपाय है.
  • श्री हनुमानचालीसा का जाप। कुछ ही मिनिट की यह साधना आपकी सारी मनोवांछित इच्छाओं को पूरा करने वाली है। श्री हनुमान चालिसा का जाप कभी भी और कहीं भी किया जा सकता है।
  • गोस्वामी तुलसी दास द्वारा रचित श्री हनुमान चालीसा अत्यंत ही सरल और सहज ही समझ में आने वाला स्तुति गान है।
  • श्री हनुमान चालीसा में हनुमान के चरित्र की बहुत ही विचित्र और अद्भुत व्याख्या की गई हैं। साथ ही इसके जाप से श्रीराम का भी गुणगान हो जाता है। श्री हनुमानजी बहुत ही कम समय की भक्ति में प्रसन्न होने वाले देवता है।
  • श्री हनुमान चालीसा की एक-एक पंक्ति भक्ति रस से सराबोर है जो आपको श्री हनुमान जी के उतने ही करीब पहुंचा देगी जितना आप उसका जाप करेंग। कुछ समय में इसके चमत्कारिक परिणाम आप सहज ही महसूस कर सकेंगे।
  • यदि ऑफिस से सम्बंधित कोई परेशानी है तो सोमवार दोपहर को लगभग दो बजे से चार बजे के मध्य श्री हनुमान चालीसा का पाठ उत्तर दिशा की ओर मुख कर के करे.
  • ध्यान रखें कि बैठने का आसन और सिर पर लाल रंग का शुद्ध वस्त्र रख कर करे. तथा अपने सामने किसी भी साफ़ बर्तन में गुड़ या गुड़ से बनीं मिठाई जरूर रखे पाठ के बाद उसे स्वयं प्रसाद के रूप में लें.
  • इसे सोमवार (शुक्ल-पक्ष) से आरम्भ कर प्रत्येक सोमवार करने से ऑफिस से सम्बंधित संकट समाप्त हो जाता है. 
  • यदि घर में पति-पत्नी की नहीं बनती है औए प्रतिदिन घर में क्लेश की स्थिति बनी रहती है तो भी इसका समाधान श्री हनुमान जी के पास है. 
  • नित्य प्रातःकाल सूर्योदय के समय पति या पत्नी एक ताम्बे के लोटे में थोडा सा गुड़ और एक छोटी इलायची डाल कर सूर्य देव के सामने बैठ कर श्री हनुमान चालीसा के दो पाठ कर सूर्य देव को अर्घ्य प्रदान कर दें.
  • कुछ ही दिनों में पति व पत्नी तथा परिवार के अन्य सदस्यों के मध्य सद्भावनापूर्ण व्यवहार होने लगेगा.
  • प्रत्येक मंगलवार तथा शनिवार सांयकाल श्री हनुमान चालीसा के पांच पाठ सामने गुग्गल का धूप जला कर करे तो घर की सन्तान नियंत्रित होती है.
  • घर में कोई संकट नहीं आता है विद्या बुद्धि बल बड़ता है समस्त दोष स्वत: ही समाप्त होने लगते है
  • . जो प्रतिदिन श्री हनुमान चालीसा का पाठ आसन में बैठ कर करता है उसकी समस्त कामनाये भगवान राम जी के द्वारा शीघ्र पूरी होती है.
  • परदेश या विदेश में सफलता नहीं मिल रही तो श्री हनुमान चालीसा के एक सौ आठ १०८ पाठ नौ दिन में करें या रात को पांच पांच पाठ रोज करने से वेदेश में प्रतिष्ठा व सफलता प्राप्त होती है
  • . प्रतिदिन किसी भी समय श्री हनुमान चालीसा का पाठ करने से नवग्रह की शान्ति तो होती है और जटिल समस्याओं से छुटकारा भी मिल जाता है
  • . धैर्य और विश्वास के साथ किया गया पाठ आपके जीवन में सफलता कि कुंजी बन सकता है